Cause Title: DARUBAI & ANR. VERSUS KAMALABAI & ORS.
बिना वसीयत उत्तराधिकार के बाद कोई भी सह-उत्तराधिकारी ‘कर्ता’ के तौर पर काम करते हुए दूसरों के हिस्से नहीं बेच सकता: सुप्रीम कोर्ट Hindu Succession Act
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (1 जून) को यह फैसला सुनाया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (Hindu Succession Act) के तहत बिना वसीयत वाली संपत्ति का उत्तराधिकार पाने वाले लोग उस संपत्ति को ‘टेनेंट्स-इन-कॉमन’ (साझा हिस्सेदार) के तौर पर रखते हैं, जिसमें उनके हिस्से तय होते हैं, न कि ‘संयुक्त पारिवारिक संपत्ति’ के तौर पर। नतीजतन, कोई भी सह-उत्तराधिकारी दूसरों की ओर से संपत्ति का निपटारा (बेच या हस्तांतरित) नहीं कर सकता, क्योंकि ऐसे मामलों में ‘कर्ता’ की अवधारणा लागू नहीं होती।
The Supreme Court on Monday ruled that under the Hindu Succession Act, 1956, those who inherit property without a will are entitled to hold the property as ‘tenants-in-common’ in which their shares are fixed and not as ‘joint family property’. As a result, no co-heir can dispose of (sell or transfer) the property on behalf of others, as the concept of ‘doer’ does not apply in such cases.
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। इस मामले में जब एक हिंदू पुरुष की बिना वसीयत मृत्यु हो गई तो उसकी दूसरी पत्नी के साथ-साथ पहली पत्नी से हुई चार बेटियां भी उसकी संपत्ति में बराबर हिस्से की हकदार थीं – यानी, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार संपत्ति में 1/5वां हिस्सा।
A division bench of Justices Sanjay Karol and Augustine George Masih heard the case. In this case, when a Hindu man died without a will, his second wife as well as his four daughters from the first wife were also entitled to an equal share in his property – that is, 1/5th of the property as per the Hindu Succession Act.
यह विवाद 1972 में स्वर्गीय दाजीबा की चार बेटियों द्वारा अपनी सौतेली मां (दारूबाई, दाजीबा की दूसरी पत्नी और सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ता) के खिलाफ दायर बंटवारे के मुकदमे से शुरू हुआ था। बेटियों ने मुकदमे वाली संपत्तियों – जिसमें महाराष्ट्र में कृषि भूमि और घर शामिल थे – में 4/5वें हिस्से का दावा किया। उन्होंने तर्क दिया कि वे और विधवा दाजीबा के ‘प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारी’ (Class I heirs) हैं। ट्रायल कोर्ट ने बेटियों के पक्ष में फैसला सुनाया। हालांकि, पहली अपीलीय अदालत ने ‘कानूनी आवश्यकता’ के आधार पर किसी तीसरे पक्ष को की गई बिक्री के संबंध में विधवा के बचाव को आंशिक रूप से स्वीकार किया था, लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला बहाल कर दिया।
The dispute began in 1972 with a partition suit filed by the four daughters of the late Dajiba against their stepmother (Darubai, Dajiba’s second wife and appellant in the Supreme Court). The daughters claimed 4/5th of the suit properties – which included agricultural land and houses in Maharashtra. He argued that he and the widow were ‘Class I heirs’ of Dajiba. The trial court ruled in favor of the daughters. Though the first appellate court had partially accepted the widow’s defence in respect of a sale made to a third party on the grounds of ‘legal necessity’, the Bombay High Court upheld the trial court’s decision.
सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य मुद्दा यह था कि क्या विधवा ‘कर्ता’ के तौर पर ‘कानूनी आवश्यकता के सिद्धांत’ का हवाला दे सकती है, और क्या उत्तराधिकारियों को संपत्ति ‘संयुक्त किरायेदार’ (Joint Tenants) के तौर पर मिली है या ‘साझा हिस्सेदार’ (Tenants-in-Common) के तौर पर।
The main issue before the Supreme Court was whether a widow could cite the ‘doctrine of legal necessity’ as a ‘doer’, and whether the heirs inherited the property as ‘joint tenants’ or ‘tenants-in-common’.
विवादित फैसला रद्द करते हुए जस्टिस करोल द्वारा लिखे गए फैसले में इस बात पर जोर दिया गया कि मुकदमे के पक्षकार संपत्ति को ‘संयुक्त किरायेदार’ के तौर पर नहीं रखते हैं – जो कि स्वामित्व का एक ऐसा रूप है, जिसमें अलग-अलग व्यक्तिगत हिस्सों के बिना एक ही एकीकृत हित होता है – बल्कि वे इसे ‘साझा हिस्सेदार’ (Tenants-in-Common) के तौर पर रखते हैं। इसमें प्रत्येक उत्तराधिकारी का अपना अलग और विशिष्ट हिस्सा होता है, जो आगे चलकर उनके अपने उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित होने के योग्य होता है। इसका मतलब है कि किसी एक सह-मालिक की मृत्यु होने पर उसका हिस्सा उत्तराधिकार कानून के अनुसार उसके अपने उत्तराधिकारियों को मिल जाता है।
The judgment written by Justice Carroll while setting aside the disputed judgment emphasized that the parties to the suit do not hold the property as ‘joint tenants’ – which is a form of ownership that has a single integrated interest without separate individual parts – but rather as ‘tenants-in-common’. In this, each heir has his own separate and distinct part, which is eligible to be transferred to their respective heirs in the future. This means that when one of the co-owners dies, his share goes to his own heirs in accordance with the succession law.
अदालत ने ‘टेनेंट्स-इन-कॉमन’ की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा, “उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि ‘A’ बिना वसीयत किए मर जाता है और अपने पीछे ‘B’ और ‘C’ को अपने वारिस के रूप में छोड़ जाता है; HSA की धारा 19 के साथ पढ़ी गई धारा 8 के तहत ‘B’ और ‘C’ संपत्ति को ‘टेनेंट्स-इन-कॉमन’ (सह-किरायेदारों) के रूप में विरासत में पाते हैं। हर किसी को एक निश्चित हिस्सा मिलता है। यदि बाद में ‘B’ की मृत्यु हो जाती है, तो ‘B’ का हिस्सा ‘B’ के अपने कानूनी वारिसों को मिलेगा, न कि वह अपने आप ‘C’ को चला जाएगा। इन दोनों प्रणालियों के बीच का अंतर ही उस संपत्ति की प्रकृति तय करता है जिसे कोई बेटा अपने पिता से विरासत में पाता है।”
इसके विपरीत, यह मानते हुए कि हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत बिना वसीयत के होने वाले उत्तराधिकार पर ‘संयुक्त किरायेदारी’ (Joint Tenancy) की अवधारणा लागू नहीं होती, अदालत ने समझाया, “संयुक्त किरायेदारी में सभी सह-मालिक मिलकर स्वामित्व का गठन करते हैं। यह ‘उत्तरजीविता के नियम’ (Rule of Survivorship) द्वारा शासित होता है। जब कोई एक संयुक्त किरायेदार मर जाता है तो उसका हित (Interest) अपने आप जीवित बचे सह-मालिकों को मिल जाता है, न कि उसकी अपनी संतान को। इसका मतलब यह है कि जब तक संयुक्त किरायेदारी बनी रहती है, तब तक किसी भी सह-मालिक का कोई अलग से विरासत में मिलने योग्य हिस्सा नहीं होता।
उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि ‘A’ और ‘B’ संयुक्त रूप से मिताक्षरा प्रणाली के तहत किसी संपत्ति के मालिक हैं; यदि ‘A’ की मृत्यु हो जाती है, तो ‘B’ उत्तरजीविता के नियम के तहत अपने आप ‘A’ के हिस्से को अपने में मिला लेता है। इसमें ‘A’ की विधवा या बच्चों को हिस्सा मिलने का कोई सवाल ही नहीं उठता। इसलिए स्वामित्व जीवित बचे सह-दायभागी (Coparcener) के पास ही बना रहता है, और कोई अलग से उत्तराधिकार नहीं होता।” अदालत ने यह भी कहा कि धारा 8 के तहत बिना वसीयत के होने वाले उत्तराधिकार के मामले में ‘कर्तृत्व’ (Kartaship) की अवधारणा लागू नहीं होगी।
अदालत ने टिप्पणी की, “धारा 8 के तहत विरासत में मिली संपत्ति अपने आप सह-दायिक संपत्ति (Coparcenary Property) का रूप नहीं ले लेती। यह माना गया कि वारिस के वंशजों को ऐसी संपत्ति में जन्म से अधिकार नहीं मिलते, क्योंकि यह विरासत व्यक्तिगत और कानूनी प्रकृति की होती है… इसलिए धारा 8 के संदर्भ में, ‘कर्ता’ (Karta) होने का सवाल आमतौर पर सिर्फ इसलिए नहीं उठता कि संपत्ति पैतृक पूर्वज से मिली है। वारिस निश्चित और अलग-अलग हिस्सों के साथ ‘टेनेंट्स-इन-कॉमन’ (सह-स्वामी) के रूप में संपत्ति पाते हैं, और संपत्ति ‘उत्तरजीविता’ (Survivorship) के बजाय ‘उत्तराधिकार’ (Succession) के आधार पर हस्तांतरित होती है।” इसलिए प्रतिवादी द्वारा अपनी बहन की शादी की कानूनी ज़रूरत के कारण ‘कर्ता’ के रूप में अपनी शक्ति का इस्तेमाल करते हुए संपत्ति के एक हिस्से को बेचना अमान्य माना गया, क्योंकि “उसे केवल संपत्ति के उस 1/5वें हिस्से के साथ अपनी मर्ज़ी से कुछ भी करने का अधिकार था, जो उसके पास था।”
[देखें M Arumugam बनाम Ammaniammal और अन्य, (2020) 11 SCC 103] Therefore, the sale of a portion of the property by the defendant in exercise of his power as ‘Karta’ due to the legal requirement of the marriage of his sister was held to be invalid, as “he had the right to do whatever he pleased with only that 1/5th share of the property which was in his possession.” [See M Arumugam vs. Ammaniammal and others, (2020) 11 SCC 103]
अदालत ने फैसला सुनाया, The court ruled, “ऊपर की गई चर्चा को देखते हुए यह माना गया कि दाजीबा की मृत्यु के बाद दारूबाई और उसकी चार सौतेली बेटियां निश्चित और अलग-अलग हिस्सों के साथ ‘टेनेंट्स-इन-कॉमन’ बन गईं, जिसमें हर किसी का हिस्सा 1/5वां है। जब उनमें से हर किसी के पास अलग और पहचाने जाने योग्य हिस्से हैं तो इस अदालत की सुविचारित राय में, प्रतिवादी के लिए ‘कर्ता’ के रूप में काम करते हुए कानूनी ज़रूरत के आधार पर संपत्ति का कोई हिस्सा बेचने का सवाल ही नहीं उठता—चाहे वह ज़रूरत किसी भी कारण से हो—क्योंकि उसे केवल संपत्ति के उस 1/5वें हिस्से के साथ अपनी मर्ज़ी से कुछ भी करने का अधिकार है, जो उसके पास है।”
“In view of the above discussion, it is held that after the death of Dajiba, Darubai and her four step daughters became ‘tenants-in-common’ with definite and distinct shares, each having 1/5th share. When each of them has separate and identifiable shares then in the considered opinion of this Court, there is no question of the respondent selling any part of the property on the basis of legal necessity while acting as ‘Karta’ Arises—whatever the reason for that need—because he has the right to do whatever he wants with only that one-fifth of the property that he has.”
खंडपीठ ने माना कि चूंकि हर वारिस का एक अलग और पहचाने जाने योग्य हिस्सा है, इसलिए विधवा ‘कर्ता’ के रूप में काम करते हुए कानूनी ज़रूरत के आधार पर पूरी संपत्ति का कोई हिस्सा नहीं बेच सकती थी। ज़्यादा-से-ज़्यादा वह केवल अपने खुद के 1/5वें हिस्से के साथ ही कोई लेन-देन कर सकती थी।
The Division Bench held that since every heir has a separate and identifiable share, the widow acting as ‘Karta’ could not sell any part of the entire property on the basis of legal necessity. At most she could only transact with 1/5th of her own share.
फैसले में कहा गया, The judgment said, “जब उनमें से हर किसी के पास अलग और पहचाने जाने योग्य हिस्से हैं तो इस अदालत की सुविचारित राय में प्रतिवादी के लिए ‘कर्ता’ के रूप में काम करते हुए कानूनी ज़रूरत के आधार पर संपत्ति का कोई हिस्सा बेचने का सवाल ही नहीं उठता।”
“When each of them holds separate and identifiable shares, in the considered opinion of this Court the question of the defendant selling any part of the property on the basis of legal necessity while acting as a ‘Karta’ does not arise.”
अपील खारिज करते हुए अदालत ने उम्मीद जताई कि यह विवाद, जो पांच दशकों से भी अधिक समय से चला आ रहा था, आखिरकार समाप्त हो जाएगा और पक्षों को “एक बेहतर, अधिक शांतिपूर्ण कल की ओर आगे बढ़ने” में सक्षम बनाएगा।
Dismissing the appeal, the court expressed hope that the dispute, which had dragged on for more than five decades, would finally come to an end and enable the parties “to move forward towards a better, more peaceful tomorrow”. Cause Title: DARUBAI & ANR. VERSUS KAMALABAI & ORS.

