SC HUF decision

Stamp Duty Valuation ज़मीन के इस्तेमाल के आधार पर होगा, न कि मास्टर प्लान में उसके वर्गीकरण के आधार पर: सुप्रीम कोर्ट

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Stamp duty valuation Cause Title: Harinder Singh Sodhi Versus State of Rajasthan and Ors.

Stamp Duty Valuation ज़मीन के इस्तेमाल के आधार पर होगा, न कि मास्टर प्लान में उसके वर्गीकरण के आधार पर: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि मास्टर प्लान के तहत प्रॉपर्टी का वर्गीकरण स्टाम्प ड्यूटी की देनदारी तय करने के लिए निर्णायक नहीं है, क्योंकि मूल्यांकन करते समय प्रॉपर्टी का असल इस्तेमाल ही मुख्य बात होती है। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने स्टाम्प मूल्यांकन के मकसद से प्रॉपर्टी को कमर्शियल माना था, सिर्फ़ इसलिए कि मैन्युफैक्चरिंग एक्टिविटी के अलावा, प्रॉपर्टी का इस्तेमाल बने हुए उत्पादों को बेचने के लिए भी किया जा रहा था।

कोर्ट ने हाईकोर्ट की राय से असहमति जताते हुए कहा, “बनी हुई चीज़ों को निश्चित रूप से बेचा जाना था और अगर उस जगह का इस्तेमाल ऐसी बिक्री के लिए भी किया जाता है, यहां तक कि रिटेल बिक्री के लिए भी, तो इससे यह नतीजा नहीं निकाला जा सकता कि प्रॉपर्टी का इस्तेमाल कमर्शियल मकसद के लिए हो रहा है, न कि इंडस्ट्रियल मकसद के लिए।” यह मामला एक ऐसी प्रॉपर्टी से जुड़ा है, जो गिफ्ट डीड के तहत आती है और जिसे रिहायशी ज़मीन के तौर पर रजिस्टर किया गया। हालांकि, सब-रजिस्ट्रार ने निरीक्षण किया और पाया कि प्रॉपर्टी कमर्शियल है; उन्होंने देखा कि इसका इस्तेमाल ‘सोढ़ी कारपेट्स’ के नाम से शोरूम के तौर पर हो रहा है और आस-पास के इलाके में कई कमर्शियल प्रतिष्ठान चल रहे हैं।

इसके बाद राजस्थान स्टाम्प एक्ट के तहत कलेक्टर ने प्रॉपर्टी का निरीक्षण किया और पाया कि उस जगह से मैन्युफैक्चरिंग एक्टिविटी/फैक्ट्री चलाई जा रही है। राजस्थान टैक्स बोर्ड ने दोनों निरीक्षण रिपोर्ट और राज्य सरकार के संबंधित सर्कुलर पर विचार करने के बाद कलेक्टर की बात से सहमति जताई। हालांकि, हाईकोर्ट ने कानूनी अधिकारियों के एक जैसे निष्कर्षों को पलट दिया। उसने कहा कि किसी प्रॉपर्टी को इंडस्ट्रियल तभी माना जा सकता है, जब वह इंडस्ट्रियल इलाके में स्थित हो और वहां होने वाली गतिविधि पूरी तरह से मैन्युफैक्चरिंग हो। चूंकि उस जगह से बने हुए सामान भी बेचे जा रहे हैं, इसलिए हाईकोर्ट ने इसे कमर्शियल प्रॉपर्टी माना।

हाईकोर्ट के फैसले से असंतुष्ट होकर सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई। इसमें तर्क दिया गया कि प्रॉपर्टी का इस्तेमाल इंडस्ट्रियल मकसद के लिए किया जा रहा है, क्योंकि इसे फैक्ट्रीज़ एक्ट, 1948 के तहत फैक्ट्री के तौर पर और डिस्ट्रिक्ट इंडस्ट्रीज़ सेंटर, जयपुर के साथ इंडस्ट्री के तौर पर रजिस्टर किया गया। अपील मंज़ूरी देते हुए जस्टिस चंद्रन के फ़ैसले में राज्य के उस तर्क को खारिज कर दिया गया कि प्रॉपर्टी को इंडस्ट्रियल के बजाय कमर्शियल माना जाना चाहिए, सिर्फ़ इसलिए कि वह भौगोलिक रूप से किसी इंडस्ट्रियल एरिया में स्थित नहीं है।

कोर्ट ने कहा, “सर्कुलर के अनुसार, डॉक्यूमेंट बनाते समय अगर ज़मीन का इस्तेमाल इंडस्ट्रियल काम के लिए किया जा रहा है, या वह RIICO इंडस्ट्रियल एरिया में स्थित है, या उसे इंडस्ट्रियल मकसद के लिए बदला गया तो उसकी कीमत इंडस्ट्रियल रेट पर तय की जाएगी। इसलिए हमारा निष्कर्ष यह है कि ज़मीन की कीमत उसके इस्तेमाल से तय होती है, न कि उसके क्लासिफ़िकेशन से, जैसा कि सरकारी वकील द्वारा पेश किए गए मास्टर प्लान में भी बताया गया।” कोर्ट ने खास तौर पर राज्य सरकार के सर्कुलर की भाषा पर भरोसा किया, जो कोर्ट के अनुसार, इलाके के क्लासिफ़िकेशन के बजाय ज़मीन के इस्तेमाल पर ज़ोर देता था। कोर्ट ने कहा, “हाईकोर्ट ने एक ऐसा टेस्ट तय करने में साफ़ तौर पर गलती की जो राज्य सरकार के उस सर्कुलर से नहीं निकलता है, जिसमें अलग-अलग प्रॉपर्टीज़ – खासकर इंडस्ट्रियल, रिहायशी और कमर्शियल प्रॉपर्टीज़ – की कीमत तय करने के नियम दिए गए।” नतीजतन, अपील मंज़ूर कर ली गई और इस तरह कानूनी अधिकारियों द्वारा दिए गए आदेश बहाल कर दिए गए। Cause Title: Harinder Singh Sodhi Versus State of Rajasthan and Ors.

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