SC HUF decision

सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेश का उल्लंघन करते हुए आरोपपत्र दाखिल करने पर झारखंड पुलिस अधिकारियों को अवमानना ​​नोटिस जारी किया

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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (1 अक्टूबर) को झारखंड पुलिस के तीन अधिकारियों को एफआईआर में आगे कोई कार्रवाई न करने के अंतरिम आदेश के बावजूद मामले में आरोपपत्र दाखिल करने पर अवमानना ​​नोटिस जारी किया।

राज्य के वकील द्वारा यह कहे जाने पर कि यह चूक के कारण हुआ, जस्टिस ओक ने टिप्पणी की,यह इस न्यायालय की घोर अवमानना ​​का मामला है। किस तरह की चूक? इसका एकमात्र कारण यह है कि प्रथम सूचनाकर्ता का पति आईपीएस अधिकारी है। यही एकमात्र कारण है।”

जस्टिस अभय ओक और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ झारखंड हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने वाली एसएलपी पर विचार कर रही थी, जिसमें आईपीएस अधिकारी की पत्नी (अब दिवंगत) द्वारा अपने मकान मालिक के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द करने से इनकार किया गया था।

याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि शिकायतकर्ता के पति पुलिस महानिदेशक थे और अब रिटायर हो चुके हैं।

राज्य द्वारा दायर जवाबी हलफ़नामे को पढ़ने के बाद अदालत ने कहा,”हलफ़नामे में राज्य के पुलिस विभाग की ओर से एक बहुत ही बेशर्मीपूर्ण कृत्य को दर्ज किया गया। चौंकाने वाली बात यह है कि आरोप पत्र में इस अदालत द्वारा पारित अंतरिम आदेश का उल्लेख किया गया। पुलिस उपाधीक्षक स्तर के अधिकारी ने बेशर्मी से यह दावा करते हुए जवाबी हलफ़नामा दायर किया कि 30 सितंबर 2023 को आरोप पत्र दायर किया गया। आरोप पत्र दायर करना और चार पत्र दायर करने को उचित ठहराना 18 अगस्त 2023 के अंतरिम आदेश का जानबूझकर उल्लंघन है।”

अदालत ने दर्ज किया,

“हम यहां यह जोड़ सकते हैं कि शिकायतकर्ता का पति प्रासंगिक समय पर आईपीएस अधिकारी था।”

जस्टिस ओक ने कहा कि पुलिस ने 18 अगस्त, 2023 के अदालत के अंतरिम आदेश की जानबूझकर अवज्ञा की। इस आदेश ने पुलिस को रांची के लोअर बाजार पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर के संबंध में आगे की कार्रवाई करने से स्पष्ट रूप से रोक दिया। न्यायालय के निर्देश के बावजूद, 30 सितंबर, 2023 को स्टेशन हाउस ऑफिसर (एसएचओ) दयानंद कुमार और जांच अधिकारी तारकेश्वर प्रसाद केसरी द्वारा आरोप पत्र दायर किया गया।

न्यायालय ने रेखांकित किया कि आरोप पत्र में अंतरिम आदेश का संदर्भ दिया गया, लेकिन फिर भी इसे दायर किया गया। न्यायालय ने पाया कि रांची के पुलिस उपाधीक्षक (DYSP) दीपक कुमार द्वारा आरोप पत्र दाखिल करना और उसका औचित्य बताना, जिन्होंने जवाबी हलफनामा दाखिल किया, आदेश का जानबूझकर उल्लंघन है।

न्यायालय ने अवमानना ​​का एक और उदाहरण भी पाया, जिसमें कहा गया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ 10 अप्रैल, 2023 के ट्रायल कोर्ट के आदेश के अनुसार 20 अप्रैल, 2023 को समाचार पत्रों में एक उद्घोषणा प्रकाशित की गई। हालांकि, अप्रैल 2017 का हाईकोर्ट का अंतरिम आदेश, जो बलपूर्वक कार्रवाई पर रोक लगाता है, उस समय भी प्रभावी था, न्यायालय ने उल्लेख किया।

सुप्रीम कोर्ट ने डीएसपी दीपक कुमार, एसएचओ दयानंद कुमार और आईओ तारकेश्वर प्रसाद केसरी को अवमानना ​​नोटिस जारी किया, जिसका जवाब 4 नवंबर 2024 को दिया जाना है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि नोटिस जिला पुलिस अधीक्षक, रांची के माध्यम से दिया जाए और तीनों अधिकारी निर्धारित तिथि पर व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश हों।

कोर्ट ने आदेश दिया,

“दीपक कुमार पुलिस उपाधीक्षक शहर रांची, दयानंद कुमार जो संबंधित समय में लोअर बाजार पुलिस स्टेशन रांची से जुड़े थे। तारकेश्वर प्रसाद केसरी भी लोअर बाजार पुलिस स्टेशन रांची से जुड़े थे, उसको अवमानना ​​का नोटिस जारी किया जाता है। नोटिस सोमवार 4 नवंबर 2024 को वापस किया जाना है। तीनों अधिकारी अगली तारीख पर व्यक्तिगत रूप से इस कोर्ट में पेश होंगे।”

यह मामला मकान मालिक-किराएदार विवाद से उत्पन्न हुआ है, जहां किराएदार, तत्कालीन डीजीपी की पत्नी ने मकान मालिक के परिवार के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी। एफआईआर में आरोप लगाया गया कि कई मौकों पर मकान मालिक के परिवार और अन्य लोगों ने जबरन उसके घर में घुसकर संपत्ति को नुकसान पहुंचाया और उसके साथ मारपीट की, जिसमें उसे उसके अपार्टमेंट से अर्धनग्न हालत में घसीटना भी शामिल है। मकान मालिक के पक्ष ने तर्क दिया कि किराएदार किराया नहीं दे रहा था। बेदखली की प्रक्रिया उप-विभागीय मजिस्ट्रेट के माध्यम से कानूनी रूप से शुरू की गई। हालांकि, मकान मालिक के अनुसार, किराएदार ने प्रतिशोधात्मक कार्रवाई के रूप में आपराधिक मामला दायर किया।

केस टाइटल- सतीश कुमार रवि बनाम झारखंड राज्य और अन्य।

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